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लोग रहते हैं अगर मिल के तो घर होता है !
वरना बस ईंट की दीवार में दर होता है !
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हम हैं अफ़सोस उसी शहर में ज़िंदा कि जहां;
जान बचती है तो ईमान का डर होता है !
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ये है इदराक का मसकन जिसे कहते हैं दिमाग़ ;
चीज़ टकराये कहीं शोर इधर होता है !
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ख़ूब देखा था जिसे हमने खुली आँखों से ;
अब वही ख़्वाब पसे-दीदा-ए-तर होता है !
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कुछ तो बनता है ज़माना मिरी वहशत का सबब ;
कुछ तिरी तल्ख़-नवाई का असर होता है !
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रोज़ माज़ी के गुनाहों की सज़ा मिलती है ;
रोज़ शमशीर-ए-नदामत पे जिगर होता है !
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ओ भले शख़्स बदल राह कि हम उनमें हैँ ;
जिनका मक़सूदे-सफ़र माल न ज़र होता है !
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साफ़गोई तो मिली है हमें विरसे में फ़राज़ ;
बाप सच्चा हो तो बेटा भी निडर होता है !
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