thi, na hai, na hogi
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मुझे ज़िंदगी से नफ़रत कभी थी न है न होगी !
सो ये ख़ुदकुशी की हाजत कभी थी न है न होगी!
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मिरी बात पर न जाओ मिरे दुश्मनों से पूछो ;
मुझे सख़्तियों से दिक़्क़त; कभी थी न है न होगी !
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मैं मिलूँ नहीं तो शिकवा, मैं कहूँ उलट तो झगड़ा;
तुम्हें बे-ग़रज़ मुहब्बत कभी थी न है न होगी !
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मिरे दोस्तों में कुछ ने मिरी शायरी सराही ;
मगर इस से मेरी शोहरत; कभी थी न है न होगी !
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जिसे हाल जानना हो मिरे पास चल के आये ;
मुझे ख़ुद नुमाई की लत; कभी थी न है न होगी !
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जिन्हें बरसों हमने पाला वही आज कह गये हैं ;
हमें आप की ज़रूरत; कभी थी न है न होगी !
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यूँ खड़े खड़े न पूछो कि मिरी निगाह-ए-नम की;
कोई मुख़्तसर वज़ाहत; कभी थी न है न होगी !
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वो तन्हा ही सर-बकफ़ है, सर-ए-सहन-ए-दुशमनां में;
जिसे बुज़दिलों की हाजत कभी थी न है न होगी !
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जिसे शौक़-ए-गुफ़्तगू हो वो ज़बान सीख आये ;
मेरी बात पस्त-क़ामत; कभी थी न है न होगी !!
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ये ज़मीं फ़राज़ वैसे तो नसीर पीर की है ;
मगर ऐसी ख़ुश-ख़िताबत कभी थी न है न होगी !