dhokha hua hai
ये मंज़र हसीं है वो मजमा लगा है !!
मगर दिल नगर में ख़िज़ाँ है, ख़ला है !!
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ये आलम किसी ज़ाब्ते से बँधा है !!
मिरा आस्ताँ गरचे बिखरा पड़ा है !!
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बुझी लौ तजल्ली की ये अलमिया है !!
सो उसने कहा था “ख़ुदा मर गया है” !!
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ये मांतिक़ है उसकी कि दुनिया अबस है ;
जो ज़र्रे की हैबत पे हैरतज़दा है !!
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ज़रा देर को ही निगाहे-करम हो ;
हमारी दवा बस तिरा देखना है !!
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मिज़ाजे-क़लंदर में है बे-नियाज़ी ;
गिला शाह को है कि बंदा बुरा है !!
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वगरना तगो-दौ के मा’नी न होते ;
कोई है जो छुप कर हमें देखता है !!
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कोई बात है क्या जिसे जानकर हम ;
कहें फिर न हरगिज़ कि धोखा हुआ है !!
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ग़रीबों की दौलत का आलम बतायें ;
उन्होंने जो छोड़ा वही आपका है !!
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सरे-बज़्म सब को ग़लत बोलते हैं ;
हम ऐसों की साहब तो गाली ग़िज़ा है !
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प्यासों की ख़ातिर सरे-हौज़े-कौसर ;
हुज़ूर आप महशर में होंगे, सुना है !!
(Part of this gHazal was written in 2020)